
अरावली पर्वत का इतिहास और विवाद
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखलाओं में से एक है और आज यही अरावली सबसे ज्यादा विवादों में भी है। अरावली को लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि यहां बड़े पैमाने पर खनन, रियल एस्टेट प्रोजेक्ट, सड़क निर्माण और अवैध कॉलोनियों का विकास हुआ है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। अरावली क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर के लिए प्राकृतिक ढाल की तरह काम करता है, लेकिन विकास के नाम पर इसका लगातार दोहन किया गया।
अरावली पर्वत की उत्पत्ति लगभग 150 करोड़ वर्ष पहले मानी जाती है। यह पर्वत श्रृंखला गुजरात के पालनपुर के पास से निकलती है और राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक जाती है। इसकी कुल लंबाई करीब 800 किलोमीटर है। अरावली मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में फैली हुई है। राजस्थान में इसका विस्तार सबसे अधिक है, जबकि हरियाणा और दिल्ली में इसका क्षेत्र छोटा लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।
पर्यावरण के लिए अरावली इसलिए जरूरी है क्योंकि यह रेगिस्तान को फैलने से रोकती है, भूजल रिचार्ज में मदद करती है और दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। अरावली क्षेत्र में मौजूद वन और पहाड़ियां धूल भरी आंधियों को रोकती हैं और बारिश के पानी को जमीन में समाने में सहायक होती हैं। यदि अरावली खत्म होती है तो दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण, जल संकट और गर्मी और भी भयावह हो जाएगी।
अरावली विवाद की जड़ अवैध खनन और निर्माण गतिविधियां हैं। हरियाणा और राजस्थान में वर्षों तक पत्थर और खनिजों का अवैध खनन होता रहा। कई जगहों पर अरावली की पहाड़ियों को समतल कर फार्महाउस, रिहायशी कॉलोनियां और व्यावसायिक प्रोजेक्ट बनाए गए। दिल्ली-एनसीआर में गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में यह समस्या सबसे ज्यादा देखने को मिली।
सुप्रीम कोर्ट का मुख्य निर्णय (2025)
केवल वो भू-आकार ही ‘अरावली पहाड़’ हैं जो स्थानीय जमीन से 100 मीटर ऊपर उठते हैं।
और अरावली रेंज तब मानी जाएगी जब दो या दो से अधिक ऐसे पहाड़ एक दूसरे से 500 मीटर के अंदर हों।
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को लेकर कई बार सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने अरावली क्षेत्र में खनन पर रोक लगाई और इसे इको-सेंसिटिव ज़ोन मानने पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली को नष्ट करना पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए खतरा है और सरकारों को इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की गतिविधि पर्यावरण कानूनों के तहत ही होनी चाहिए।
सरकार की तरफ से समय-समय पर अलग-अलग बयान और नीतियां सामने आईं। कुछ राज्यों ने अरावली को वन क्षेत्र मानने से जुड़े नियमों में बदलाव की कोशिश की, जिस पर विवाद और बढ़ गया। पर्यावरणविदों का आरोप है कि नियमों में ढील देने से बिल्डरों और खनन माफिया को फायदा पहुंचाया गया। वहीं सरकार का कहना रहा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
आज अरावली विवाद सिर्फ पहाड़ों का नहीं, बल्कि भविष्य का सवाल बन चुका है। अगर अरावली को नहीं बचाया गया तो दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में जल संकट, प्रदूषण और जलवायु असंतुलन और गंभीर हो जाएगा। यही वजह है कि अरावली को बचाने की मांग लगातार तेज होती जा रही है और यह मुद्दा अदालत से लेकर संसद और आम जनता तक चर्चा का विषय बना हुआ है।