
BMC चुनाव में ठाकरे बंधुओं का जमानत जब्त
महाराष्ट्र की राजनीति में देवेंद्र फडणवीस की जीत को यूँ ही “देव-भाऊ की वापसी” नहीं कहा जा रहा। यह जीत केवल सीटों की नहीं, बल्कि वर्चस्व, नैरेटिव और ज़मीन पर पकड़ की लड़ाई थी। फडणवीस ने बेहद सधे हुए तरीके से खुद को एक शांत, रणनीतिक और निर्णायक नेता के रूप में पेश किया। जहां उद्धव ठाकरे भावनात्मक अपील और पुरानी शिवसेना की विरासत पर निर्भर रहे, वहीं फडणवीस ने संगठन, कैडर और माइक्रो-मैनेजमेंट पर फोकस किया। नागपुर से लेकर विदर्भ, मुंबई महानगर, पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा तक भाजपा और महायुति ने निर्णायक बढ़त बनाई। खास बात यह रही कि जिन इलाकों को लंबे समय तक ठाकरे गुट का गढ़ माना जाता था, वहीं पर फडणवीस की रणनीति ने खेल पलट दिया।
इस पूरी लड़ाई में देवेंद्र फडणवीस का रोल “फ्रंट-फुट पर दिखने वाले नेता” से ज्यादा “बैक-एंड स्ट्रैटेजिस्ट” का रहा। टिकट वितरण, स्थानीय असंतोष को साधना, सहयोगी दलों के साथ सीट-शेयरिंग और शहरी-ग्रामीण संतुलन—हर स्तर पर उनकी पकड़ दिखी। उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि पार्टी टूट के बाद ज़मीनी संगठन कमजोर पड़ गया, जबकि फडणवीस ने उसी जमीन पर अपनी पैठ और मजबूत की। मुंबई और आसपास की सीटों पर भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) की जीत ने यह साफ कर दिया कि ठाकरे नाम का जादू अब पहले जैसा नहीं रहा। कुल मिलाकर, यह जीत देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक सूझ-बूझ, धैर्य और लंबे गेम की रणनीति का नतीजा मानी जा रही है, जिसने महाराष्ट्र की सत्ता की दिशा ही बदल दी।
कुल मिलाकर सीटों का वितरण (सारांश)
🔹 भारतीय जनता पार्टी (BJP) — लगभग 132 सीटें जीतीं
🔹 शिव सेना (महायुति/शिंदे गुट) — लगभग 57 सीटें
🔹 एनसीपी (अजित पवार) — लगभग 41 सीटें
🔹 विपक्ष (MVA) — कांग्रेस, शिवसेना (ठाकरें गुट) और शरद पवार गुट मिलकर लगभग 46 सीटें जीते।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में बीजेपी मुंबई में अपना मेयर अपने दम पर बनाने जा रही है 25 साल बाद ।