शंकराचार्य विवाद: पद, परंपरा और प्रयागराज घटना का पूरा संदर्भ

क्यों नाराज है ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती चाहते थे कि वह पालकी से ही संगम स्नान करने जाएं लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी जिससे वो नाराज हो गए शंकराचार्य जी ने आरोप लगाया कि प्रशासन उनके समर्थकों और संतों के साथ धक्का मुक्की की गई ।

शंकराचार्य का इतिहास और कैसे होती है इनका चुनाव

शंकराचार्य हिंदू धर्म में आदि शंकराचार्य द्वारा 8वीं सदी में स्थापित चार प्रमुख मठों (पीठों) – ज्योतिर्मठ, शारदा मठ, गोवर्धन मठ और शृंगेरी मठ – के मुख्य आध्यात्मिक अध्यक्ष (हेड) को कहा जाता है, जो अद्वैत वेदांत का प्रचार-प्रसार और सनातन धर्म की रक्षा का कार्य करते हैं; यह एक धार्मिक उपाधि है जिसे गुरु-शिष्य परंपरा और मठ की मान्यता से ही मिलता है, न कि सरकारी शक्ति से, और इस पद पर पहुँचने की प्रक्रिया पारंपरिक दीक्षा-उत्तराधिकार पर आधारित होती है तथा इसे लेकर समय-समय पर परंपरा और उत्तराधिकार के मतभेद रहे हैं। इस समय प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ‘शंकराचार्य’ शीर्षक और स्नान प्रक्रिया को लेकर विवाद गरमा गया है |

मेला प्रशासन ने उनसे 24 घंटों में यह साबित करने को कहा कि वे ‘शंकराचार्य’ हैं, क्योंकि उनके पद की वैधता सुप्रीम कोर्ट और धार्मिक परंपरा में विवादित है; इस वजह से उनके मौनी अमावस्या के दिन संगम पर *पालकी रोकने, छत्र टूटने, पुलिस और शिष्यों के बीच झड़प, तथा प्रशासन-धर्मगुरु के बीच नोटिस और बहस जैसी घटनाएँ सामने आईं, जिन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बयान देते हुए विवाद को धर्म-संस्कृति और राजनीतिक दृष्टि से जोड़ा है।

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