
सोमनाथ मंदिर भारत के गुजरात राज्य के प्रभास पाटन में स्थित है और यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। इसे “अनादि काल से विद्यमान” कहा गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसका निर्माण चंद्रदेव (सोमराज) ने सोने से किया था, जिसे बाद में रावण ने चांदी, भगवान कृष्ण ने लकड़ी और भीमदेव सोलंकी ने पत्थर से पुनर्निर्मित कराया। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा का प्रतीक रहा है।
सोमनाथ मंदिर पर सबसे पहला बड़ा आक्रमण 1025 ई. में महमूद ग़ज़नवी ने किया। उसने मंदिर को लूटा, शिवलिंग को खंडित किया और अपार धन-संपत्ति ले गया। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक, और औरंगज़ेब के शासनकाल में भी मंदिर को बार-बार तोड़ा गया। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 17 बार सोमनाथ मंदिर को नष्ट किया गया, लेकिन हर बार यह और अधिक भव्य रूप में खड़ा हुआ।
इन आक्रमणों के दौरान हजारों पुजारियों, साधुओं और श्रद्धालुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्होंने शिवभक्ति नहीं छोड़ी। मंदिर को बचाने और पुनर्निर्माण के लिए कई राजाओं और भक्तों ने संघर्ष किया। भीमदेव प्रथम, मालवा के भोज राजा, और अहिल्याबाई होल्कर ने अलग-अलग कालखंडों में इसके पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आधुनिक भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से संभव हुआ। उन्होंने आज़ादी के बाद कहा था कि “सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत के आत्मसम्मान का प्रतीक होगा”। उनके निधन के बाद के. एम. मुंशी ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया।
सोमनाथ मंदिर की यह 1000 साल की यात्रा केवल टूटने और बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आस्था, और आत्मबल की अमर गाथा है। यह मंदिर आज भी संदेश देता है कि आक्रमणों से इमारतें गिर सकती हैं, लेकिन आस्था और संस्कार कभी नष्ट नहीं होते।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी सोमनाथ मंदिर के बारे में सोशल मीडिया पर और लेख के माध्यम से देश को सोमनाथ मंदिर के इतिहास और संघर्ष भरी गाथाओं के बारे में देश की जनता को अवगत कराया है।