वंदे मातरम् लिखने की शुरुआत और इतिहास
वंदे मातरम् का मूल रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी।
इसकी पहली पब्लिक पब्लिकेशन 7 नवंबर 1875 में हुई थी।
बाद में 1882 में, बंकिम चंद्र ने इसे अपनी उपन्यास आनन्दमठ (Anandamath) में शामिल किया।
वंदे मातरम् एक 6- stanza (छंदों) वाली कविता थी, जिसमें मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, देशभक्ति, और “माँ-भारत” की देवी रूपक छवि प्रमुख थी।
शुरुआत में ये गीत ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ मुक्तिदा आंदोलन में एक शक्तिशाली “क्रांति-गीत” के रूप में उभरा।
🔄 राष्ट्रगीत बनने तक — वंदे मातरम् की यात्रा
1896 में, महान साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी रबीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार कांग्रेस अधिवेशन (Indian National Congress) में वंदे मातरम् को संगीतबद्ध स्वर में गाया।
ब्रिटिश शासन के दौरान, वंदे मातरम् की लोकप्रियता और राजनीतिक भावना से ब्रिटिश लोग चिंतित रहे। कई स्थानों पर इसे फैलने से रोकने की कोशिश हुई — पर विरोध और प्रतिबंधों ने इसे और अधिक लोकप्रिय बना दिया।
1905 के बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् एक “युद्ध-कुहूकी” (war-cry) बन गया।
1937 में, Indian National Congress (INC) की कार्यसमिति ने यह निर्णय लिया कि सार्वजनिक सभा या राष्ट्रीय आयोजनों में केवल वंदे मातरम् के पहले दो छंद (stanzas) गाये जाएंगे। कारण था कि बाकी छंदों में हिंदू देवी-देवताओं की धार्मिक प्रतीकों (जैसे देवी दुर्गा, लक्ष्मी आदि) की आभाष थी, जिससे अन्य धर्मों के लोगों की आपत्ति हो सकती थी।
24 जनवरी 1950 को, जब भारत गणराज्य बना, तब वंदे मातरम् को औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय गीत” (National Song) के रूप में स्वीकार किया गया।
लेकिन — ध्यान देने योग्य है — संविधान में वंदे मातरम् का कोई उल्लेख नहीं है। यानी कानूनी रूप से यह “राष्ट्रीय गीत” की स्थिति में नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और पारंपरिक महत्व का गीत है।
⚠️ विवाद — क्या-क्या हुआ, और क्यों हो रहा?
विवाद की जड़ धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता (secularism / multi-religious sensitivity) से जुड़ी थी। वंदे मातरम् की मूल कविता में देवी माता की पूजा, देवी रूपक चित्रण था, जिसे कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने ‘असहिष्णुता’ या ‘धार्मिक असहयोग’ बताया।
इसलिए 1937 में पहले दो छंदों को चुनकर सार्वजनिक उपयोग के लिए स्वीकार किया गया — ताकि यह गीत “हिंदू-विशिष्ट” नहीं दिखे, और देश की धार्मिक विविधता का ध्यान रखा जा सके।
बावजूद इसके, दौर-दौर पर यह विवाद उठता रहा है कि क्या वंदे मातरम् को हर नागरिक — चाहे धर्म कोई भी हो — गाना या सुनना चाहिए, या नहीं। कई मुस्लिम संगठनों ने इसे धार्मिक दृष्टिकोण से अस्वीकार्य बताया है।
इस कारण, वंदे मातरम् को लेकर एक “प्यार” और “विरोध” — दोनों भाव — आज भी समाज में जारी हैं।
🏛️ 2025 — संसद में वंदे मातरम् पर फिर से बहस (आज की घटना)
7 नवंबर 2025 को, वंदे मातरम् के 150 साल पूरे हुए — इसी अवसर पर 2025-26 के शीतकालीन संसद सत्र में इस राष्ट्रीय गीत पर विशेष चर्चा शुरू हुई।
आज (8 दिसंबर 2025), नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री) ने लोक सभा में वंदे मातरम् को लेकर बहस की शुरुआत की। कहा गया कि 1937 में वंदे मातरम् के हिस्सों को हटाना और उसे “कट-छाँट” कर देना, वास्तव में इतिहास को तोड़ना था — और यह कांग्रेस द्वारा धार्मिक और राजनीतिक मजबूरियों के चलते किया गया था।
इस बहस के दौरान, विरोधी दलों और इतिहासकारों ने आरोप लगाया कि सरकार इतिहास को अपनी राजनीतिक ज़रूरतों के अनुसार “पुनर्लेखित” (rewrite) करना चाह रही है।
बहस में यह भी पूछा गया कि वंदे मातरम् को सिर्फ “ऐतिहासिक-देशभक्ति गीत” के रूप में देखें या इसे उस रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए जो हर धर्म, हर समुदाय के लिए स्वीकार्य हो।
इस बहस का राजनीतिक आयाम भी है — क्योंकि आज के समय में वंदे मातरम् पर यह पुनरावलोकन, 1937 और उसके बाद हुए राजनीतिक फैसलों (और देश की धार्मिक, सामाजिक अस्मिता) को फिर से सामने ला रहा है।

वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत या कविता नहीं है — यह भारत की आज़ादी, उसकी विरासत, उसकी एकता और उस विविधता के बीच संतुलन की एक झलक है। इस गीत ने देशभक्ति के संकल्प को जगाया, ब्रिटिश-शासन के खिलाफ आज़ादी की आवाज़ बनी, और आज भी वह बहस का विषय है — कि हमारा देश, उसकी सोच, उसकी पहचान किस तरह की होनी चाहिए।
2025 की संसद में जो बहस हुई — वह इस सवाल को फिर से उठा रही है: क्या हमें पुराने प्रतीकों को नए दृष्टिकोण से देखना चाहिए? क्या हम पहले जैसी भावनाओं को उसी रूप में बरकरार रखें, या समय और सामाजिक बदलाव के अनुसार उसका स्वरूप बदलें?