क्या है MNREGA जिसका नया नाम VB G राम G किया जा रहा है

मनरेगा क्या है जिसका नाम सरकार बदल के VG जीरामजी कर रही है

सरकार ने मनरेगा यानी MGNREGA (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) का नाम बदलने के लिए विधेयक संसद में पेश करने का प्रस्ताव रखा था। जो अब पास हो गया है उसके अनुसार नया नाम होगा।

पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, जिसे आमतौर पर मनरेगा कहा जाता है, भारत सरकार की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी ग्रामीण रोजगार योजनाओं में से एक है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण भारत में रहने वाले गरीब और मजदूर वर्ग को आर्थिक सुरक्षा देना है ताकि उन्हें रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन न करना पड़े। इसी मनरेगा का नाम महात्मा गांधी के जगह पूज्य बापू जी कर रही है ।

मनरेगा की शुरुआत वर्ष 2005 में यूपीए सरकार के दौरान की गई थी और इसे 2 फरवरी 2006 से देश के कुछ जिलों में लागू किया गया। बाद में इसे पूरे भारत में विस्तार दिया गया। शुरुआत में इसका नाम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) था, लेकिन 2009 में महात्मा गांधी के नाम पर इसका नाम बदलकर मनरेगा कर दिया गया। जिसे अब मोदी सरकार पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया गया है यह दुनिया की सबसे बड़ी कानूनी रोजगार गारंटी योजना मानी जाती है।

इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्र के किसी भी परिवार को, जो अकुशल श्रम करने को तैयार है, साल में कम से कम 100 दिन का रोजगार देने की कानूनी गारंटी दी जाती है। जिसे नए बदलाव में 125 दिन का रोजगार गारंटी कर दी गई है । इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर जॉब कार्ड बनाया जाता है। मजदूरों से तालाब खुदाई, सड़क निर्माण, जल संरक्षण, पौधारोपण, नहर सफाई जैसे काम कराए जाते हैं। काम न मिलने की स्थिति में सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है।

मनरेगा से गांवों में रोजगार बढ़ा, मजदूरी दर में सुधार हुआ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। खासकर महिलाओं की भागीदारी इस योजना में काफी ज्यादा रही है, जिससे महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिला। सूखे और आर्थिक संकट के समय यह योजना ग्रामीणों के लिए जीवनरेखा साबित हुई है।

हालांकि, मनरेगा को लेकर समय-समय पर संसद में काफी बवाल भी होता रहा है। विपक्ष का आरोप रहता है कि सरकार मनरेगा का बजट घटा रही है, मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं हो रहा और योजना को कमजोर किया जा रहा है। वहीं सरकार का कहना होता है कि योजना में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल सिस्टम, आधार लिंकिंग और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर लागू किया गया है।

संसद में यह मुद्दा इसलिए भी गरमाता है क्योंकि मनरेगा सीधे गरीबों और गांवों से जुड़ी योजना है। विपक्ष इसे गरीबों का अधिकार बताता है, जबकि सरकार इसे जरूरत आधारित योजना कहती है। कई बार फंड आवंटन, काम के दिनों की संख्या और मजदूरी दर को लेकर तीखी बहस देखने को मिलती है, जिस कारण सदन में हंगामा तक हो जाता है।

आज के समय में मनरेगा सिर्फ रोजगार योजना नहीं बल्कि ग्रामीण विकास का एक मजबूत आधार बन चुकी है। सड़क, पानी, खेती और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कामों के जरिए यह गांवों की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभा रही है। बावजूद इसके, भुगतान में देरी, भ्रष्टाचार और तकनीकी समस्याएं अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

कुल मिलाकर, मनरेगा जिसे मोदी सरकार (gramg) कर दिया है भारत के ग्रामीण गरीबों के लिए सुरक्षा कवच की तरह है। संसद में चाहे जितना भी विवाद हो, लेकिन जमीनी स्तर पर यह योजना करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी से जुड़ी हुई है और आने वाले समय में भी इसकी अहमियत बनी रहेगी।

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