
न्यू ईयर ईव (31 दिसंबर) पर जिन वर्करों ने हड़ताल की घोषणा की है, वे मुख्य रूप से गिग वर्कर्स हैं। इनमें फूड डिलीवरी, ग्रॉसरी डिलीवरी, ई-कॉमर्स पार्सल डिलीवरी और कुछ जगह कैब/राइड से जुड़े वर्कर शामिल हैं। ये वही लोग हैं जो Zomato, Swiggy, Blinkit, Zepto, Amazon, Flipkart जैसी ऐप-आधारित कंपनियों के साथ पार्टनर के रूप में काम करते हैं। ये नियमित कर्मचारी नहीं होते, बल्कि डेली या ऑर्डर-आधारित कमाई पर निर्भर रहते हैं।
इन वर्करों ने हड़ताल इसलिए की है क्योंकि उन्हें कम कमाई, ज्यादा काम का दबाव, समय की सख्त डेडलाइन, सड़क पर काम करते समय सुरक्षा की कमी और बीमा व सोशल सिक्योरिटी जैसे फायदे न मिलने की शिकायत है। उनका कहना है कि त्योहारों और पीक समय में उनसे ज्यादा काम लिया जाता है, लेकिन उसके बदले भुगतान या सुरक्षा पर्याप्त नहीं होती। वे न्यूनतम कमाई की गारंटी, बेहतर इंसेंटिव, बीमा और सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं।
इस हड़ताल का असर आम लोगों की पब्लिक लाइफ पर पड़ सकता है। न्यू ईयर पर ऑनलाइन खाना, ग्रॉसरी और जरूरी सामान की डिलीवरी में देरी या रुकावट आ सकती है। कई ऑर्डर कैंसिल हो सकते हैं, जिससे पार्टी, घर के कार्यक्रम और छोटे कारोबारों पर भी असर पड़ेगा। रेस्टोरेंट और दुकानदारों को भी नुकसान हो सकता है क्योंकि नए साल के समय ऑर्डर आमतौर पर ज्यादा होते हैं।
गिग वर्कर्स का काम पूरी तरह मेहनत पर आधारित होता है। वे दिन-रात सड़क पर रहकर डिलीवरी करते हैं और उनकी रोज़ की कमाई उसी दिन के काम पर निर्भर करती है। अधिकतर वर्कर अपने परिवार की जिम्मेदारी इसी आय से चलाते हैं। अगर वे एक दिन काम नहीं करते, तो उस दिन की पूरी कमाई खत्म हो जाती है, जिससे घर के खर्च, किराया और बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है।
बेनिफिट की बात करें तो कुछ कंपनियां इंसेंटिव या बोनस देती हैं, लेकिन स्थायी वेतन, पीएफ, ईएसआई, पेड लीव और मजबूत बीमा जैसी सुविधाएं ज्यादातर वर्करों को नहीं मिलतीं। नुकसान यह है कि हड़ताल के दिन उनकी आमदनी रुक जाती है, लेकिन लंबे समय में उन्हें उम्मीद है कि इससे उनकी आवाज सुनी जाएगी और काम की शर्तों में सुधार होगा।
कुल मिलाकर, यह हड़ताल सिर्फ वर्करों की नहीं बल्कि सिस्टम से जुड़े सवालों की है। एक तरफ आम लोगों को असुविधा हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ ये वर्कर अपने हक, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के लिए आवाज उठा रहे हैं।