
मकर संक्रांति भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है, जिसे सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर हर साल 14 या 15 जनवरी को आता है और इसे खगोलीय दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण यात्रा शुरू होती है। उत्तरायण को शुभ काल माना गया है, इसलिए मकर संक्रांति को नए आरंभ, सकारात्मकता और उन्नति का प्रतीक समझा जाता है।
मकर संक्रांति का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। वेदों और पुराणों में सूर्य को ऊर्जा, जीवन और चेतना का स्रोत माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने जाते हैं, इसलिए यह दिन संबंधों में मधुरता और समरसता का भी प्रतीक है। महाभारत काल में भी इस पर्व का विशेष उल्लेख मिलता है, जब भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन ही देह त्याग किया था, क्योंकि उत्तरायण को मोक्षदायक माना जाता है।
यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि कृषि और प्रकृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति के समय रबी की फसल तैयार होती है, जिससे किसानों के जीवन में खुशहाली आती है। इसी कारण यह पर्व कृतज्ञता और उत्सव का रूप ले लेता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग नामों से मनाया जाता है—जैसे पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में माघ बिहू, गुजरात में उत्तरायण और उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व।
मकर संक्रांति की परंपराओं में गंगा स्नान, दान-पुण्य, तिल-गुड़ का सेवन और पतंग उड़ाना प्रमुख हैं। तिल और गुड़ को शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है, खासकर सर्दियों में, और यह आपसी प्रेम व मिठास का भी प्रतीक है। इस दिन दान करने से पुण्य की प्राप्ति मानी जाती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
संक्षेप में, मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि धर्म, विज्ञान, प्रकृति और संस्कृति का सुंदर संगम है। यह पर्व हमें सकारात्मक सोच, परिश्रम के फल और नए सिरे से जीवन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।