SIR प्रक्रिया, प्रदर्शन और ज्ञानेश कुमार: क्या है पूरा विवाद? जानिए Special Intensive Revision की पूरी कहानी

ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के सवाल

देश में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ रहा है। चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अपडेट करना है, ताकि डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें और योग्य मतदाताओं का नाम सूची में बना रहे। वहीं विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्य मतदाताओं के नाम हटने की आशंका को लेकर सवाल उठाए हैं।

SIR क्या है?

SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची की सामान्य समीक्षा से अधिक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें बूथ स्तर पर मतदाताओं के नाम, पते और पात्रता की दोबारा जाँच की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में सही और पात्र मतदाताओं के नाम रहें तथा डुप्लिकेट, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की प्रविष्टियों को हटाया जा सके।

चुनाव आयोग के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची को साफ और अद्यतन रखना है और यह सुनिश्चित करना है कि कोई योग्य मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न हो।

कैसे होती है SIR की प्रक्रिया?

SIR के दौरान कई चरणों में मतदाता सूची की जाँच की जाती है। सबसे पहले बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO घर-घर जाकर मतदाताओं से संबंधित जानकारी और Enumeration Form की प्रक्रिया पूरी करते हैं।

इसके बाद ऐसे नामों की पहचान की जाती है जो Absent, Shifted, Dead या Duplicate यानी ASDD श्रेणी में आ सकते हैं। जाँच के बाद Draft Electoral Roll जारी की जाती है।

यदि किसी योग्य व्यक्ति का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है या किसी नाम को लेकर आपत्ति है, तो निर्धारित अवधि में दावा और आपत्ति दाखिल की जा सकती है। इन दावों और आपत्तियों की जाँच के बाद अंतिम मतदाता सूची यानी Final Electoral Roll प्रकाशित की जाती है।

SIR को लेकर प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?

SIR के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले दलों और संगठनों का मुख्य सवाल यह है कि मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए पुराने दस्तावेज उपलब्ध कराने में परेशानी हो सकती है।

आलोचकों का कहना है कि गरीब परिवारों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और अन्य कमजोर वर्गों के पास पुराने जन्म, निवास, जमीन या शिक्षा संबंधी दस्तावेज उपलब्ध न होने की स्थिति में उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है।

विपक्षी दलों ने यह भी आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं और इसका असर कुछ सामाजिक वर्गों पर असमान रूप से पड़ सकता है। हालांकि, इन आरोपों को चुनाव आयोग ने स्वीकार नहीं किया है।

13 करोड़ से अधिक नाम हटने का दावा

SIR को लेकर सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के दावों को लेकर है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए गए।

हालांकि, ऐसे आंकड़ों को समझते समय यह देखना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से किसी नाम का हटना हमेशा स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से बाहर होना नहीं होता। दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाता अपना नाम वापस शामिल कराने की मांग कर सकते हैं।

यही कारण है कि SIR की पूरी प्रक्रिया में Draft Roll, Claims & Objections और Final Roll के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है।

विपक्ष का चुनाव आयोग पर क्या आरोप है?

कांग्रेस, TMC, DMK और अन्य विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पारदर्शिता की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए हैं और इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

कुछ विपक्षी नेताओं और संगठनों ने SIR पर रोक लगाने तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई या उनके पद से हटाने की मांग भी की है।

कांग्रेस की प्रमुख मांगों में SIR को रोकना, हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करना और मतदाता सूची में हुए बड़े बदलावों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक करना शामिल है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य किसी योग्य नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित करना नहीं है। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची को सही और विश्वसनीय बनाने के लिए सत्यापन आवश्यक है।

आयोग ने मतदाताओं की सुविधा के लिए प्रक्रिया में बदलाव भी किए हैं। नोटिस मिलने वाले मतदाताओं के लिए दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। कुछ मामलों में BLO घर जाकर आवश्यक दस्तावेज ले सकता है और उन्हें ECINET पर अपलोड कर सकता है। सुनवाई की जरूरत केवल विशेष परिस्थितियों में होने की व्यवस्था बताई गई है।

चुनाव आयोग में भी सामने आया विवाद

SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी मतभेद की खबरें सामने आई हैं। सितंबर 2026 की रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR और आयोग की कुछ प्रक्रियाओं को लेकर पिछले करीब 10 महीनों में कई बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।

रिपोर्टों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया। इसके बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि इन आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर हुए। आयोग ने यह भी कहा कि मतदाताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए SIR प्रक्रिया में बदलाव किए गए।

ज्ञानेश कुमार कौन हैं?

ज्ञानेश कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त यानी Chief Election Commissioner हैं। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।

SIR को लेकर बढ़े राजनीतिक विवाद के बीच उनका नाम विपक्ष के निशाने पर आया है। विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव और कथित पारदर्शिता की कमी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।

वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है और SIR इसी उद्देश्य से की जा रही प्रक्रिया है।

आसान भाषा में समझें SIR का विवाद

मान लीजिए किसी व्यक्ति का नाम एक ही विधानसभा क्षेत्र में दो अलग-अलग जगह दर्ज है। SIR के दौरान BLO दोनों रिकॉर्ड की जाँच करेगा। यदि दोनों रिकॉर्ड एक ही व्यक्ति के पाए जाते हैं, तो डुप्लिकेट प्रविष्टि को हटाया जा सकता है और योग्य व्यक्ति का सही रिकॉर्ड सूची में रखा जाएगा।

लेकिन विवाद उस स्थिति में पैदा होता है जब कोई व्यक्ति वास्तव में योग्य मतदाता हो, लेकिन सत्यापन के दौरान आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध न करा पाए या उसका रिकॉर्ड गलत तरीके से अनुपलब्ध, स्थानांतरित या डुप्लिकेट मान लिया जाए।

यही वजह है कि SIR को लेकर समर्थक इसे मतदाता सूची को साफ करने की जरूरी प्रक्रिया बताते हैं, जबकि विरोधी इसे मतदाताओं के अधिकारों और पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं।

अभी क्या है स्थिति?

SIR को लेकर फिलहाल चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच मतभेद जारी हैं। आयोग का कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है और पात्र मतदाताओं के लिए दावा-आपत्ति तथा सुनवाई की व्यवस्था उपलब्ध है।

दूसरी ओर, विपक्षी दल और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और जिन योग्य मतदाताओं के नाम हटे हैं, उनकी पहचान कर उन्हें वापस सूची में शामिल किया जाए।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Draft Electoral Roll से नाम हटना अंतिम निर्णय नहीं माना जाता। पात्र मतदाता दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए अपना नाम दोबारा शामिल कराने की मांग कर सकते हैं। इसलिए SIR को समझने के लिए Draft List, Claims & Objections और Final Electoral Roll—इन तीनों चरणों को साथ देखना जरूरी है।

SIR केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह अब बड़ा राजनीतिक और लोकतांत्रिक मुद्दा बन चुकी है। चुनाव आयोग इसे साफ और भरोसेमंद मतदाता सूची के लिए जरूरी कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे लेकर पारदर्शिता, दस्तावेजों की उपलब्धता और योग्य मतदाताओं के नाम हटने की आशंका पर सवाल उठा रहा है।

आने वाले समय में इस विवाद का केंद्र यही रहेगा कि कितने नाम अंतिम सूची में वापस जुड़ते हैं, कितने नाम वास्तव में अपात्र पाए जाते हैं और चुनाव आयोग सत्यापन प्रक्रिया को कितना पारदर्शी बनाता है।

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