जंतर-मंतर से लद्दाख तक: कौन हैं सोनम वांगचुक, क्यों कर रहे हैं दिल्ली में आमरण अनशन?

सोनम वांगचुक का अनशन

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनका यह आंदोलन केवल लद्दाख के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, युवाओं के रोजगार और देश की परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता जैसे मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला रहा है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह आमरण अनशन कई दिनों से जारी है और जैसे–जैसे दिन बीत रहे हैं, देश के अलग–अलग हिस्सों से छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण से जुड़े लोग उनकी मुहिम से जुड़ते जा रहे हैं।

कौन हैं सोनम वांगचुक?

सोनम वांगचुक लद्दाख के जाने-माने इंजीनियर, इनोवेटर, पर्यावरणविद और शिक्षा सुधारक हैं। उन्हें वर्ष 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


उनकी पहचान “आइस स्टूपा” तकनीक से बनी, जिसके जरिए हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के पानी को संरक्षित कर गर्मियों में सिंचाई और पेयजल के लिए उपलब्ध कराया जाता है। यह तकनीक आज दुनिया के कई पर्वतीय क्षेत्रों में अपनाई जा रही है।
बॉलीवुड फिल्म ‘3 इडियट्स’ का लोकप्रिय किरदार ‘फुंसुख वांगड़ू’ भी काफी हद तक सोनम वांगचुक के व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है, जिससे वे युवाओं के बीच एक प्रेरणास्रोत बन गए।


आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?


साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
शुरुआत में लोगों ने इसे विकास की दिशा में बड़ा कदम माना, लेकिन समय के साथ स्थानीय नागरिकों ने कई चिंताएं उठाईं—


जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा
स्थानीय युवाओं के रोजगार
पर्यावरण संरक्षण
आदिवासी पहचान और संस्कृति
राजनीतिक प्रतिनिधित्व
इन्हीं मुद्दों को लेकर सोनम वांगचुक ने शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया।


सोनम वांगचुक की चार प्रमुख मांगें

लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा
उनका कहना है कि केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण स्थानीय लोगों के पास पर्याप्त लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हैं।

संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए
इससे आदिवासी समुदायों की भूमि, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिल सकेगी।

युवाओं के लिए रोजगार
लद्दाख में लोक सेवा आयोग की स्थापना और स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता।

बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व
लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा प्रतिनिधित्व और मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था।
अब दिल्ली में आमरण अनशन क्यों?
जंतर-मंतर पर चल रहा उनका वर्तमान आमरण अनशन दो बड़े मुद्दों पर केंद्रित है—

लद्दाख के अधिकार


वे चाहते हैं कि सरकार संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े वादों को जल्द लागू करे।
छात्रों के लिए न्याय
देशभर में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आए पेपर लीक और अनियमितताओं के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई है।
उनका कहना है कि युवाओं का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए और परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।

जंतर-मंतर पर क्या माहौल है?


आमरण अनशन स्थल पर लगातार लोगों की भीड़ बढ़ रही है।
समर्थन देने वालों में शामिल हैं—


छात्र संगठन
पर्यावरण कार्यकर्ता
सामाजिक संगठन
शिक्षाविद
लद्दाख के नागरिक
विभिन्न राज्यों से आए युवा
पूरे आंदोलन में शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध पर जोर दिया जा रहा है।


यह आंदोलन किसके खिलाफ है?


सोनम वांगचुक का कहना है कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि नीति और व्यवस्था में सुधार की मांग है।
वे चाहते हैं—
लोकतांत्रिक जवाबदेही
पर्यावरण संरक्षण
पारदर्शी शासन
युवाओं के अधिकार
आदिवासी समुदायों की सुरक्षा


लद्दाख के लिए छठी अनुसूची क्यों जरूरी मानी जा रही है?


विशेषज्ञों के अनुसार यदि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा मिलती है तो—


जमीन की खरीद-बिक्री पर नियंत्रण संभव होगा।
स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की रक्षा होगी।
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बेहतर होगा।
स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार मिलेंगे।


आइस स्टूपा परियोजना क्या है?


सोनम वांगचुक की सबसे चर्चित परियोजना आइस स्टूपा है।
इस तकनीक में सर्दियों के दौरान पानी को शंकु आकार की बर्फ संरचना में जमा किया जाता है, जो गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलकर खेती और पेयजल के लिए पानी उपलब्ध कराती है।
यह परियोजना जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हिमालयी क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है।


देशभर में क्यों हो रही है चर्चा?

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन केवल लद्दाख की मांगों तक सीमित नहीं है। यह आंदोलन पर्यावरण संरक्षण, लोकतांत्रिक अधिकार, आदिवासी सुरक्षा और देश के युवाओं के भविष्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच होने वाली अगली बातचीत पर टिकी है, क्योंकि उसका असर केवल लद्दाख ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय नीति और शासन व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

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